एक नाम जो सेवा का पर्याय बना – विष्णु कुमार जी

50 के दशक में शुगर टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की डिग्री, हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड का ज्वाइनिंग लैटर 23 बरस के एक युवक के लिए करियर की शुरुआत इससे बेहतर और क्या हो सकती थी | पर शायद बैंगलौर से 90 किलोमीटर दूर अक्कीरामपुर के संभ्रांत राजौरिया परिवार की सातवी संतान विष्णु के सपने सारे संसार से अलग थे, वो झुग्गियों में बसने वाले साधनहीन लोगों का जीवन संवारना चाहता था वो सडकों पर फेंक दिए जाने वाले अवांछित शिशुओं को एक सम्मान जनक जीवन देना चाहता था, इसिलए 1962 में विष्णु राजौरिया ने जब अपने पिता “श्री अनंत राजौरिया” से संघ का प्रचारक निकलने की इजाजत मांगी थी तभी वे समझ गए थे कि उनका बेटा अब कभी घर नहीं लौटेगा | कौन थे विष्णु जी ? कैसे देशभर में खड़े किए उन्होंने सेवा कार्य?

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कहते हैं आग से नहीं खेलना चाहिये *

मगर जब *आग*, खुद आप से खेलने पर आमादा हो तब?ऐसा ही कुछ हुआ था साल *2014* में मुम्बई की *दामूनगर* बस्ती में, जब भीषण आग मानव जीवन से खिलवाड़ करने पर आमादा थी। ऐसे भयावह हालातों में कैसे स्वयंसेवकों ने अपने साहस से विकराल अग्नि को समर्पण करने को विवश कर दिया और सैकड़ों मनुष्यों के प्राणों की रक्षा की!! साहस की इस अभूतपूर्व गाथा को 

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साथी हाथ बढ़ाना 

आज वो चाहकर भी अपने आंसू रोक नहीं पा रही थी, दरअसल यह खुशी का अतिरेक था, जो आखों से बह निकला था, थोड़े से पैसों की खातिर 20 बरस पूर्व, पिता द्वारा साहूकार के पास गिरवी रख दी गयी ज़मीन सीता ने आज सूद समेत पूरे 60,000 रुपये चुका कर छुड़वा ली थी। तमिलनाडू के एक छोटे से गांव कडापेरी की सीता का परिवार अब कर्ज की बेड़ियों से मुक्त था। यह कर्ज़ कभी उतर न पाता अगर “श्री मधुरम्मन” स्वयं सहायता समूह की बहनें उसकी मदद को आगे न आतीं ।तमिलनाडू के लोगों में स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आये परिवर्तनों के बारे में  जानने के लिए क्लिक करें :-

जब उजाले की आमद होती है 

जब उजाले की आमद होती है, अँधेरा टिक नहीं पता। अँधेरा चाहे अपराध का हो या अशिक्षा का, उजाले के आगे उसे मिटना ही पड़ता है। अंधेरा झाँसी के *दातार* गांव की *कबूतरा जनजाति* के बीच से हटा, जब संघ के प्रयासों से यहां शिक्षा का सूर्योदय हुआ, तब वह हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कबूतरा जनजाति के बच्चों में ना सिर्फ शिक्षा का प्रसार हुआ वल्कि इस वर्ग ने अपनी आपराधिक छवि का कलंक धो समाज की मुख्यधारा के साथ कदम ताल मिला चलना शुरू कर दिया। संघ के स्वयंसेवकों की इस अनूठी परिवर्तनकारी गाथा को जानने जानने के लिए क्लिक करें :-

मिला संघ का साथ, तो बनी गणित से बिगड़ती बात 

सुदूर पूर्वोत्तर में अरुणांचल प्रदेश के गांव *बोमदिला* के *300 छात्रों* के साथ भी यही हुआ। पहाड़ी दर्रे के यह युवा *गणित* की दुर्गम चढ़ाई पर ऐसे फिसले कि उनके अंको का सेंसेक्स इतना नीचे गया कि सब के सब फेल। निराशा के झंझावत में घिरे इन युवाओं ने सामूहिक रूप से पढ़ाई छोड़ने का फैसला ले लिया। मगर जब संघ के स्वयंसेवकों को इसकी भनक लगी, तो शुरू हुआ *गणित विजय* अभियान, डिज़ाइन हुआ अनूठा *मैथ्स क्रश कोर्स* और संघ प्रेरणा से, इससे जुड़े अन्य प्रांतों के उच्च शिक्षित युवा प्रोफेशनल्स। बस फिर क्या था, कुछ ही सालों में *बोमदिला* व आसपास के गांवो मे गणित की गुत्थी में उलझे रहने वाले छात्र अब उस पर सरपट सवारी करने लगे। समुद्र तल से *8000 फ़ीट* उपर हुए इस रोचक परिवर्तन के अनछुए पहलु जानने के लिए क्लिक करें :-

सूरत में बदली गांवों की सीरत

नशे में धुत पति से हर रोज मार खाती, सारे अपमान चुपचाप सह जाती। इस नशे ने, ना जाने कितनी औरतों को कम उम्र में विधवा कर दिया था।वनवासी गांव की ये औरतें इस नारकीय जीवन को अपना भाग्य समझ कर जी रही थी। इनको स्वाभिमान व आत्मनिर्भरता का पाठ पढाया डॉ अंबेडकर वनवासी कल्याण ट्रस्ट (सूरत) ने।राष्ट्रीय सेवा भारती से संलग्न इस ट्रस्ट ने डांग व तापी जिले में 130 सखी मंडलों की रचना कर, 1600 महिलाओं में स्वावलंबन,आत्मनिर्भरता और नेतृत्व के भाव को जागृत किया है। ट्रस्ट ने 250 गांवों में किसानों की आय बढाने के लिए उन्हें जैविक खेती करना व स्वयं उन्नत बीज को निर्माण करना सिखाया।  जानने के लिए क्लिक करें :-

सैंकड़ों गावों में बहाई विकास की गंगा सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट ने जीती गरीबी से जंग

ढगेवाडी-महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव। आप में से शायद ज्यादातर ढगेवाडी नही गए होंगे, और बहुत संभव है इसका नाम तक न सुना हो। मगर 32 वर्ष पूर्व एक दम्पति वहां पहुंचा और अपनी संकल्प शक्ति से इस गुमनाम से गांव की तस्वीर बदल दी। बात 1985 की है महाराष्ट्र के अकोला नगर, जिला – अहमदनगर से महज 35 किलोमीटर दूर बसे 55 घरों के छोटे से गाँव में सारी जमीन बंजर थी, पानी के लिए महज़ एक छोटा सा तालाब था और वो भी गाँव से 5 किलोमीटर दूर, तब मोहनराव घैसास जी व उनकी पत्नी स्मिता जी ने इस गांव को अपनी कर्म भूमि बनाया । जानने के लिए क्लिक करें :-

एक आदर्श गाँव -मोहद

यहाँ प्रवेश करते ही लगता है कि, हम किसी विशेष गांव में आ गए हैं ।घर-घर के दरवाजे पर ओम व स्वस्तिक की छाप ,दीवारों पर जतन से उकेरे गए सुविचार, तो कहीं ब्रम्हांड के रहस्यों को परत दर परत खोलती जानकारियाँ ,तो कहीं चौपालों पर संस्कृत में अभिवादन करते लोग ।  जानने के लिए क्लिक करें :-

सपने सच हुए- यमगरवाड़ी -एक अनूठी पहल

हनुमान मंदिर की चौखट पर अपने दो छोटे भाई बहनों के साथ आज की सर्द रात भी रेखा शायद बिना कंबल के ठिठुरते हुए भूखे–पेट गुजार देती ,यदि उसे लेने कुछ भले लोग न पहुँचे होते। महाराष्ट्र के नाँदेड़ जिले में किनवट के नजदीक एक छोटा सा गाँव है पाटोदा....जहाँ रेखा अपने माता-पिता के साथ रहती थी।  जानने के लिए क्लिक करें :-

आनंद धाम - घरौंदा अपनों का

हंसते खिलखिलाते चेहरे, अनुभव से परिपूर्ण चमकती आंखें यहां रहने वालों की पहचान है। जिंदादिली से भरे इन लोगों को देखकर यह अंदाजा तक नहीं लगाया जा सकता कि, इनके अपने वर्षों से इनके साथ नहीं हैं। बात हो रही है, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बीचों बीच स्थित \"आनंदधाम वरिष्ठ जन सेवा केंद्र\" की।  जानने के लिए क्लिक करें :-

साथी हाथ बढाना (विवेकानंद सेवा मंडल - महाराष्ट्र)

वीर सावरकर मंडल ने बदली शिवे गांव की तस्वीर

सपनों के शहर मुंबई में जिंदगी भी लोकल ट्रेन की तरह दौडती रहती है। किंतु अपने सपने पूरा करने के लिए आगे बढ़ने की इस होड़ में कुछ युवा ऐसे भी थे, जिन्होंने पीछे छूट गए लोगों का हाथ थामकर उन्हें आगे बढाया। उच्च शिक्षित युवाओं के पढ़ाई के बाद बस कमाई के इस मिथक को तोड़ा स्वामी विवेकानंद सेवा मंडल के युवाओं ने। जानने के लिए क्लिक करें :-

बबन दगडू  पर तो आज मानो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। इस गरीब कुम्हार के लिए जब मिट्टी के बर्तन बनाकर शहर में गुजारा करना मुश्किल हो गया था, तब वह अपने गांव लौट कर अपने छोटे से खेत में जुट गया। किंतु हाय री किस्मत! 5 माह की मेहनत के बाद जो 40 क्विंटल फसल उपजी उसमें भी आग लग गई। तभी उसकी मदद को आगे आए गांव के वीर सावरकर मंडल के युवा। जानने के लिए क्लिक करें :-

युवा संकल्प की अनुपम मिसाल - आनंदपुर भाली

"कौन कहता है  कि आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो" प्रसिद्ध कवि  दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां आनंदपुर भाली में चरितार्थ होती नजर आती है।हरियाणा के रोहतक जिले  का  ये गांव कभी राजनीतिक विद्वेष का अड्डा बना हुआ था। हालात कुछ ऐसे थे कि गांव के अधिकांश युवा  जेल  व थानों से   ठीकठाक परिचित थे।बस कन्डेक्टर  या तो इन्हें  बिठाते नहीं  थे यदि बिठा भी लिया तो किराया मांगने से डरते थे । जानने के लिए क्लिक करें :-

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